शातिर हैं बैठे सजा, अपनी अजब दुकान।
रुपए फेंक,ले जाइए, मनचाहा सम्मान।।
झोला भर सम्मान हैं, रञ्च नहीं उपयोग।
दाताओं के छन रहे, उनसे छप्पन भोग।।
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