Saturday, 15 February 2025

डॉ.सन्तोष कुमार माधव

शातिर हैं बैठे सजा, अपनी अजब दुकान।

रुपए फेंक,ले जाइए, मनचाहा सम्मान।।


झोला भर सम्मान हैं, रञ्च नहीं उपयोग।

दाताओं के छन रहे, उनसे छप्पन भोग।।

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